
जिसके घर हर महीने तनख़्वाह हो आई
वो पूछता है किसान क्यों है सड़क पर भाई
महँगाई भत्ता मिलता तो है फिर काहे इतनी तबाही
तो हमारी भी दो टूक सुनो तुम भाई
जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।
खेत खलिहानों को तुमने बस फ़िल्मों में देखा
और उधार के खेतों में बस सेल्फ़ी खींचा
तुम भी समझ जाते क्यों ज़रूरी है एम एस पी देना
ग़र कड़क ठंड में एक खेत को होता सींचा।
तू भी पाता खुद को सिंघु बॉर्डर पर, जब “पे कमिशन” ख़तरे में होता
सर्दी दिखती ना कोविड दिखता, साहूकार जब तीन रुपया
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