जिसके घर हर महीने तनख़्वाह हो आई 

वो पूछता है किसान क्यों है सड़क पर भाई 

महँगाई भत्ता मिलता तो है फिर काहे इतनी तबाही

तो हमारी भी दो टूक सुनो तुम भाई 

जाके पैर  फटी बिवाईवो क्या जाने पीर पराई। 


खेत खलिहानों को तुमने बस फ़िल्मों में देखा 

और उधार के खेतों में बस सेल्फ़ी खींचा 

तुम भी समझ जाते क्यों ज़रूरी है एम एस पी देना 

ग़र कड़क ठंड में एक खेत को होता सींचा। 


तू भी पाता खुद को सिंघु बॉर्डर परजब “पे कमिशन” ख़तरे में होता 

सर्दी दिखती ना कोविड दिखतासाहूकार जब तीन रुपया सैकड़ा लेता 

है हिम्मत तो एक फसल उगा कर देखपगला जाता जब लागत भी वापस ना पाता

बिकता जब आलू और प्याज़ एक दो रुपये मेंक्या करता ग़र मैं फाँसी ना खाता।  


पहले अंग्रेजों ने रौंदा फिर साहूकारों ने नोचाक्या बच गया जो अब वॉल्मार्ट को भेजा 

आमदनी बढ़ेगी सम्मान मिलेगासोच कर अन्नदाता ने तुमको चुन कर भेजा 

ना मान मिला ना भाव मिलाउल्टे आतंकी होने का अपमान मिला

सुनो शहरी सत्ताधारी जब अमरीका धान रोकेगाफ़िर यह नशा टूटेगा। 

तुम भारत को आत्मनिर्भर बनाने चले होवो तो मेरे ही “हल” से हो पाएगा

मेरे ही हल से हो पाएगा।