उड़ता गबरू
क्यों लड़खड़ाए हैं कदम, जब दिल में सपनों की एक आग है
नहीं है ख़ुद पर “वश” तेरा, तो आई जवानी क्या ख़ाक है
देखा देखी और झूठी शान में, गबरू की रवानी हुई राख है
“जीवन में नशा” ठीक था, पर “नशे में जीवन” एक शमशान है
छल्ले बनाके डूड हम “कूल” बनेंगे, कैसा तेरा यह बुख़ार है
आख़िर कैसे टूटेगा ये “ज्वर”, जब यार तेरा ख़ुद इसका शिकार है
ढकोसले है सब बहाने तेरे, चिट्टे दारू सुट्टे का चढ़ा तुझे ख़ुमार है
संभल जा प्यारे अभी वक़्त है, क्योंकि मौत के आड़े बस शब-ए-इंतिज़ार है।
