महफ़ूज़ नहीं मैं अपने ही घर में
क्या आस रखूँ फिर बेग़ाने जग में
होते रहे ज़ुल्म मर्द होने की मद में
मैं भी सहती रही सब ठीक करने की ज़िद में।
क्या पड़ौसी क्या समाज भला
जब अपनों ने ही दुत्कार दिया
देख कर भी सब अनदेखा किया
फिर खा कर मार आज भूख़ को शांत किया।
मुद्दा आख़िर क्या है वो क्यों इतना हिंसक हुआ
कभी नशे में ग़ुस्सा तेज हुआ
रोज़गार छिना तो भी मेरा दोष हुआ
मिलकर करेंगे सामना हर मुश्क़िल का
पर तुझे तो हिंसा करके ही संतोष हुआ।
सामने छत पर जो सब देख कर मौन रहा
उसकी कायरता का भी इसमें योग रहा
ग़र आज वो हिम्मत जुटा कर टोक गया
समझो अपनी बेटी के लिए “बेहतर कल” जोड़ गया।।


