आसमां में इक नव परिंदा, उड़ रहा तो जरुर है।
कह रहा पंखों में जान मेरे, पर अभी सफर तो दूर है।।

देखता है जब जमी पर, तेज पंखों को हिला कर।
मै हवा को चिरता हूँ हुआ इसका थोड़ा तो गुरूर है।।

छोड़ तिनके का घोसला, अपनो से कर फासला।
सोचता मन ही मन मंजिल मेरी, नव उमंगों से तो चूर है।।

सफर में कुछ संगी साथी, रास्ते में आयी आंधी।
डरा गिरने से तब, अपनों की यादें आयी तो जरूर है।।

जूझते पवन से फर, अब कोसों दिखता है सफर।
जब हुए कुछ पंख बोझिल, तब समझा मंजिल तो दूर है।।

अब निराशा घेरे उसको, कोसे भी तो अब वो किसको 
आश अपनो से मिलन की त्यागा, हो गया तो मजबूर है।।

छोड़कर जाओ जब घर को, त्यागें जब अपने जन को
जरा अंत को विचार लेना, अपनो बिन ये तो नामंजूर है।।
 
लेखिका : डाॅ. कीर्ति पाण्डेय