दिन खिल आया


शून्य वर्ण से रंगी

आभामयी सट्टीका सुन्दर

कर मेहँदी,

माथे पे बिन्दु,

झींगुर जैसे पग में घुंघरू,

धीमे-धीमे, हौले-हौले,

दुंदुभि सुगम हो वधू-वर!


रत्नानदि, कालिन्दी लगती

कनल विभा रजनी का आँचल,

रात रमा रेशम सा आँचल

लहरा कर रखा भूमि पर,

नभ के सारे रत्न तोड के

टाँक लिया अपने वस्त्रों पर!


सुन्दर आभा, मोहित काया

इठलाती, बलखाती माया,

कबंध, मेघ और पवन, गगन से

क्रीड़ करता उसका साया!


तर्जन को अधरों पे रख के

कहती ठहरो, न शोर मचाओ,

सभी अभी हैं स्वप्नदेश में

ॐ ध्वनि का राग लगाओ!


देखो कबंध अब हुई सिन्दूरी

शून्य वर्ण हुई लाल सुनहरी,

घूँघट ओढी, लालिमा गहरी

घटा हटा के रमा ये बैठी!


धीमे-धीमे, हौले-हौले

मुस्काती, शर्माती, उर्जित

अपने हाथों पट को उठाया,

अहा! माथे की दीव्य ये आभा

सूर्य सुशोभित दिन खिल आया!


उज्वल प्रज्वल दिवा देवी ने

कर कमलों से उर्जित करके

भूमि पर जीवनदान दिया,

आज पुनः फिर नभ चूम कर

अमृत कलश प्रदान किया!


-डॉ. दीप्ति प्रिया

विचार साहित्य की आधुनिक कवयित्री लेखिका,

प्रकाशित काव्य संग्रह: “विमोह”, “दीप्राणिका