dr arun kumar shastri / ek abodh balak // arun atript


तन्हाईयों से घायल

न आधा न मुक्कम्ल

 तेरी याद में खोया 

कल रात मैं बिंदास सोया 

 

नयन उदास उदास थे 

तुम न दूर न ही मेरे पास थे 

लेकिन मेरी तरह बिंदास थे 

 

जीवन की धरा पर

विस्तार के विषय का 

तर्क संगत गान का 

कर्ण प्रिय राग का 

 

व्योम के वितान का 

सृष्टि के विधान का 

अटपटे विचार का 

कोई बीज, न था बोया 

जन्मोजन्म, अजन्मा 

यहीं कहीं था,

जो अनन्कुरित पड़ा 

आकर के ढूंढ दोगी  

ओ सखी,

यदि समय हो ज़रा

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