बस शाम ही ढली थी
उस रोज़ , हर रोज़ की तरह।और वो उदास हो गया
किसी प्यासे दरख़्त की तरह। न जाने कैसा भय था
न जाने किसका भय था।
कोई बात रू -ब - रू न थी
फिर भी कुछ न कुछ तो था।
पूछने पर रो देता था
चुप रहो तो खो जाता था।
अब ऐसा मुरझाया चेहरा
हम से तो न देखा जाता था।
बस शाम ही ढली थी
उस रोज़ , हर रोज़ की तरह।और वो उदास हो गया
किसी प्यासे दरख़्त की तरह।
सदियों का कोई ग़म था कोई पास होते हुए भी
उससे बहुत दूर था।
कुछ तो था ऐसा
जिसका हमको नहीं इलम था।
एक ज़ाम भरा हमने सरकाया
ज़ानिब उसकी ओर जब भरके
डबडबाई आँखों से
देखा हमको तब उसने।
एक ज़ाम भरा हमने।।
सरकाया ज़ानिब उसकी ओर जब भरके
डबडबाई आँखों से देखा हमको तब उसने।



