मन अधीर, नयनों से नीर,

दोनों का आमंत्रण तुम ही हो।

तीव्र धड़कन,और ये तड़पन,

दोनों का नियंत्रण तुम ही हो।


मजबूरियों के भंवर अब तुम्हें,

कभी पास मेरे आने न देंगे।

तुम जो चाहोगी भी कभी तो, 

ये प्रणय के गीत गाने न देंगे।


दूरियाँ और दूर न जाने,

कितनी होती जा रही हैं।

स्मृतियाँ अनायास ही न जाने,

तुम्हें नजदीक मेरे ला रही हैं।


ये नियति थी तो भी कैसे,

हम ये स्वयं को समझाए।

रिक्तता जो शेष रह गयी,

पूर्ण कैसे जीवन में कर पायें।


डॉ अनुराग पाण्डेय