प्रेम की भावनाओं का उबाल,
ओह! अपने चर्मोत्कर्ष पर था।
वाणी तो नितान्त ही मौन थी,
मात्र नयनों के मध्य ही संघर्ष था।
ये घटित यूँही नही हो रहा था एक साथ।
आज भी याद है मुझे मैं,तुम और वो बरसात।।
संकोच और सकुचाहट थी,
अत्यंत ही दोनो के उरों में।
मन के भाव स्थिर थे मन में,
शब्द उतर न रहे किसी के अधरों मे।
न रोके से रूकते थे वो जज्बात।
आज भी याद है मुझे मैं,तुम और वो बरसात।।
वो बूंदों की हलचल,
भिगो क्या रही थी।
वो खुशबू हवा की,
प्रेम गीत गा रही थी।
बड़ी सुंदर लग रही थी कायनात।
आज भी याद है मुझे मैं,तुम और वो बरसात।।
थे हमारे उन हाथों में,
गर्म चाय के प्याले।
दोनों ही डूबे हों नयनों में,
तो फिर कौन निकाले।
अमिट थी वो घटना,हसीं था वो साथ।
आज भी याद है मुझे मैं,तुम और वो बरसात।।
डॉ अनुराग पाण्डेय


