मैं जो हूँ जैसा हूँ,बदलना नही चाहता

किसी और सांचे में ढलना नही चाहता 


लड़खड़ा ही जाते हैं कदम कभी-कभी

वरना कौन यहाँ संभलना नही चाहता


मैनें देखा है इश्क की चोटों को करीब से

अब कोई ख्वाब निगाहों में पलना नही चाहता


बड़ा क़ातिल है जुनू इश्क का अनुराग

यूँही परवाना शमां में जलना नहीं चाहता


डॉ अनुराग पाण्डेय