यूं तो काफ़ी नज़दीकियां रही हैं दरमियान हमारे तुम्हारे,
अब अनछुई क़िताब सा महसूस करती हूं, बस चले आओ।

इरादा बस इतना है कि मैं तेरे काबिल बन पाऊं किसी तरह,
अब जरूरी है साथ तुम्हारा, यूं रूठकर न जाओ बस चले आओ।

ज़िंदगी की हजारों गर्दिशों में लाखों गलतफहमियां हो जाती हैं,
रफ्ता-रफ्ता सारी मुश्किलें मिटाएंगे हम दोनो, बस चले आओ