लोग हो गए अब पुराने,
कौन जाए घर बुलाने।
जंगल घरों से मिल रहा है,
देख कर सब हैं दीवाने।

असहाय बनकर खेत देखें,
अब कौन उनमें बीज फेंखे।
कौन हल का फल सजाए,
सब दूर रहकर हाथ सेंकें।

कह रहे हैं गाँव बंजर,
देख लो शहरों के मंजर।
घर उजड़ते गाँव देखे,
अब खड़े दो-चार मन्दर।

घूमने आए विदेशी,
लापता हैं क्यों स्वदेशी।
क्या शहर अच्छे हुए हैं,
पूछते चरते मवेशी।

गाँव के चश्ने का पानी,
सूख कर कहता कहानी।
अब कलश लेकर न आती,
पास मेरे वह जवानी।

तुम दूर जाकर लौट आए,
धरती-अम्बर सबको भाए।
मेघ बरसे फिर ख़ुशी में,
रजकण पुनः धरती समाए।

भूपेन्द्र डोंगरियाल
24/06/2018