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सच की धमक


तेरी मुस्कराहट के सलीक़े से परेशान हूँ सच में,तू झूठ की तलबगार है ये दुनिया भी नहीं जानती।

तेरे हाथ में ये आइना क्यों सच से शर्माता रहा,चटकेगी तेरी आरसी तू सच की धमक नहीं जानती।

— भूपेन्द्र डोंगरियाल
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