दो डग आगे बढ़े,
चार डग पीछे हटे।
इस तरह मुश्किल राह,
कटे तो कैसे कटे।

समझो या तो हम कमज़ोर हैं,
या दिलों में बैठे चोर हैं।
वरना हिम्मत जुटा आगे बढ़,
मुश्किलों से कहो पीछे हटे।

समय अनुकूल कभी न था,
तू व्यर्थ मत कह अपनी व्यथा।
जा चीर दे दुश्मन का सीना,
भय से गद्दारों का सीना फ़टे।

समझदारी ज़्यादा दिखाकर,
अवसर को माटी में मिलाकर।
जो विश्वास खोता और रोता,
अब उससे कहो पीछे हटे।

या तो जीत की मंशा से बढ़,
अपने कथन-करनी पर अड़।
मिले कर्म पथ पर हार जब भी,
जीत के लिए फिर से डटे।

दो डग आगे बढ़े,
चार डग पीछे हटे।
इस तरह मुश्किल राह,
कटे तो कैसे कटे।

भूपेन्द्र डोंगरियाल