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बन्द मुट्ठी


कोहरे की धुंध में,छिप गया दिनकर कहीं।ठंड से सिकुड़े बदन,बैठे रहे मिलकर कहीं।।चाय की चले चुस्कियाँ,अर सामने अलाव हो।बन्द मुट्ठी खुल गयी,जब ठण्ड तेरा दाव हो।।भूपेन्द्र डोंगरियाल20/12/2025

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