सप्ताह के सातों दिन,
अच्छा चलता है,
बाजार रोज़गार का।
नीलाम होते हैं लाखों बेरोजगार,
कौड़ियों के दाम पर।
सुबह की ताज़ी नौकरी,
मुश्किल से,
लौटती-सिसकती आती शाम घर।
बड़ा कठिन काम है,
नौकरी की अस्मत को बचाना।
क्योंकि अनगिनत कुँवारे,
इस आस में जीवित हैं,
कि कभी तो नौकरी रूपी नगवधू,
उनकी जोर-जवानी आजमाएगी।
टूटेगा नौकर-नौकरी का पुराना बन्धन।
लेकिन वह भूल जाता है,
कि आने वाला अगला दिन,
उसे जवानी में भी बूढ़ा बना सकता है।
क्योंकि उसकी प्रियतमा नौकरी,
नए हमसफ़र के साथ,
गलबहियाँ करती हुयी,
नया-नया रिश्ता तोड़ जाएगी।
या फिर किसी दलाल के हाथों,
नीलाम होकर,
उसकी पड़ोसन बन जाएगी।

भूपेन्द्र डोंगरियाल