मेरे घर से कुछ दूर,
हाँ,तीन सौ मीटर दूर।
दो आम के पेड़ हैं।
आम के पेड़ सौ साल पुराने हैं।
ये नाम वाले आम के पेड़,
अब नहीं अनजाने हैं।
एक का नाम कालू ,
तो दूसरे का नाम पीलू है।
मुझे मालूम है,
आपको यह नाम सुनकर,
हँसी जरूर आएगी।
और फिर इन आम के पेड़ों जैसे,
मेरी कविता भी मशहूर हो जाएगी।
बाबू जी ने पहली बार,
जब इन पेड़ों से परिचय करवाया।
बड़े भावुक थे बाबू जी,
बाबू जी ने कहा,
यह दोनों भी मेरे बाबू जी,
और तुम्हारे दादा जी की अमानत है।
उन्होंने इन पेड़ों को बेटे जैसा पाला था,
इनके नज़दीक,कुछ दूर,
यहीं कहीं,कभी हमारा गौशाला था।
इनसे हमारा रिश्ता,बहुत पुराना है।
अब ये मत कहना बेटा,
तू इनसे अनजाना है।
सुनते हैं दादा जी के हाथ से,
लगे थे यह आम के पेड़।
दोनों बीजू आम के पेड़,
जब पहली बार फले थे,
इनकी उम्र थी बीस वर्ष।
इनकी टहनियों पर,
आम के बौंर देख,
दादा जी को हुआ हर्ष।
कहने लगे अब मेरे कालू-पीलू,
दो जवान कमाऊ-पूत हैं।
इनके मीठे फल,बच्चे-बूढ़े खाएँगे,
इनकी अमराई पर भौंरे गुनगुनायेंगे।
इनकी ठण्डी छाँव में बैठेंगे पथिक,
तो कोयल उन्हें मधुर गीत सुनाएंगे।
मेरे जाने के बाद,
ये तुम्हें,
हमेशा मेरी याद दिलाएंगे।
फाल्गुन महीने में आए बौंर,
बैसाख में अमिया बन गयी।
फिर आयी जेठ की लू,
कच्चे आमों का आम पना,
कुल्हड़ों में छन गयी।
फिर आया आषाढ़ का महीना,
हरे-हरे आमों ने,
अब अपना रंग बदल दिया।
कालू के रस भरे काले आम,
पीलू के पीले गूदेवाले आम।
हवा के मन्द झोंको के संग,
अब टप-टप टपकने लगे पके आम।
डाल का पहला पका आम,
अपने पितृदेवों के नाम।
डाल का दूजा पका आम,
अपने भूमिदेवता के नाम।
उसके बाद टपकते रहे आम,
लपकते रहे राम-श्याम।
बेटा फिर एक दिन,
जब तेरे दादा जी चल बसे।
तब सूना-सूना था,
यह घर उनके बिन।
आम के पेड़ भी तब भी खड़े थे,
और आज भी ये पेड़ यथावत खड़े हैं।
हाँ समय के साथ ये बहुत बढ़े हैं।
दादा जी का कुनबा,
जैसे-जैसे बढ़ता गया,
कालू-पीलू का कुनबा भी,
पलता गया फलता गया।
आज यह जो बगीचा है,
सच कहूँ तो इसे,
हमारे पित्रों ने ही सींचा है।
भूपेन्द्र डोंगरियाल
