मेरी ख्वाहिशे सुबह सी, वो शाम से ढलते गये
वो त्याग करते रहे और हम पलते गये
झुलसाने लगी धूप ज़ब बन गये छाया
देख काली घटा बादलो की बन गये साया
ठिठुरन हमारी देख खुद ही जलते गये
वो त्याग करते रहे और हम पलते गये
फूल समझ हमको वो बन गये माली
सींच दिया पौधा लहरा दी डाली
हम लता से उठे, वो पत्तों से बिखरते गये
वो त्याग करते रहे और हम पलते गये
झरनों सा गिरा मैं कभी तो चाल बन गये
लेकर पर्वतों का रूप वो ढाल बन गये
संभाल दिया हमको, वो फिसलते गये
वो त्याग करते रहे और हम पलते गये
दीपिका


