रंगो से बिखरी इस दुनिया में
एक कोने में हजारों रंग बिक रहे थे !
कुछ हरे थे , कुछ काले थे ,कुछ तो बड़े ही अजीब दिख रहे थे !
सोचा दो पल रुक कर देख लूं इन चटखिले रंगो से भरी ये विचित्र सी दुनिया !
तभी पीछे से एक आवाज़ आयी ! वापस लौट जाओ मैडम आगे बंद है सारे रास्ते और गलियां !!
पर फिर भी उसके बातों को नजरअंदाज कर
उन तंग गलियों में मैं आगे बढ़ती गई ,
कुछ दूर पर मैंने देखा !
रंगो के बाज़ार लगे थे
मर्दों से मिलते जुलते कुछ बड़े ही अजीब किस्म के जा़त खड़े थे ।
किसी से सुना ये खरीदार हैं इस शहर के
अपने लिए रंग खरीदते हैं ये इन औरतों के दो गज वाले इस बिस्तर से !
इन दबी - अटकी गलियों में सुना है कभी रात नहीं होती , कभी इन औरतों ने दिन नहीं देखा , कभी इनकी खुद से भी मुलाकात नहीं होती !
सदियों से आती - जाती इस भीड़ ने कभी सजाया है वैशाली की नगर वधू का शहर तो कभी बंबई की कीमती जमीनों को करते हैं ये कमाठीपुरा से रोशन चारों पहर !
सुना है ये रंग आगे भी यूहीं सजते रहेंगे !
आगे भी बिस्तर बिछाए जाएंगे
आगे भी दावत यूं ही बंटते रहेंगे !!
क्यों कि जब तक ये जिस्म है
तब तक इस जिस्म का अपना एक स्वाद होगा
इस स्वाद के करोडो शौकीन होंगे
इन शौकिनों का दर - बदर अपना बाज़ार होगा !!
