तुम थी या हो इसी सवाल की उलझन
रात दिन ज़हर ज़हर खाब को जगाती है
लहू लहू रिसती रहती हो आँखों से
प्यास प्यास लब जलाती हो
तुम थी या हो इसी सवाल की उलझन
होने में तुम्हारा जिस्म छु नहीं सकता
और न हो ऐसा लगता तो नहीं है
क्योकि महसूस करता हूँ हलकी सी बेरुखी तुम्हारी
जो कभी मेरी ज़ुल्फ़ उड़ा देती
ज़हन की बेचैनी रक्स कानो में तुम्हारे होने का घोल जाती
मगर हवस है इन बेज़ुबान होंटो को
जिन्होंने तुम्हारे होंटो के लहू को
छलकने से पहले अपने जिस्म की आग में उड़ा दिया
तुम भाप की तरह मेरे जिस्म से लिपटी
और घुल गयी हो मोम की रोसनी की तरह
अब तुम्हारा अक्स नहीं
तुम्हारी ज़रुरत धुँआ धुँआ चुभ रही हो आँखों को
मैं रो नहीं रहा हाँ कतरा कतरा रिस रही हो पलकों पर
तुम थी या हो इसी सवाल की उलझन
— दिव्म्ना