जो है भी और नहीं भी है
किसी परछाई की धूप से उलझन की तरह
किसी दरख़्त के साये दोनों परेसान हो जैसे
न ये करीब है न वो पास कही है
इंतज़ार जिसपे तमाम रात
और ज़हर बुझे नोको से लगते तारे
डस रहे हो चुप भी हो
और इंतज़ार में हो
के कब धूप खिले जिस्म पे आये रोशनी का जाल
फिर अक्स उभरे सायों के अलग अलग आकर
और फिर हो बदलती हुई उचाइयां
घटती हुई लम्बाइयां
जो है भी और नहीं भी है
— दिव्म्ना