
फिर गुज़रने का मन है उसी शमशान से
जहा कभी पैरों पे छाले भी शुकून देते थे
जहाँ काँटों से लदी बेले रूह को धूल देती थी
जहाँ शोर ही शोर होता था खामोशियों का
कुछ कहता और दौड़कर उसी को सुनता
अजीब कशमकश में सवाल और जवाब होते थे
और लगता ऐसा के जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं
और सबकुछ कह लिया गया हो सुन ल
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