फिर गुज़रने का मन है उसी शमशान से
जहा कभी पैरों पे छाले भी शुकून देते थे
जहाँ काँटों से लदी बेले रूह को धूल देती थी
जहाँ शोर ही शोर होता था खामोशियों का
कुछ कहता और दौड़कर उसी को सुनता
अजीब कशमकश में सवाल और जवाब होते थे
और लगता ऐसा के जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं
और सबकुछ कह लिया गया हो सुन लिया गया हो
उसी भस्म को लपेट लूँ जिसपे कभी रफू किया था
उसी गिरेबान में झाकून जो चाक हो तर हो लहू की महक से
खोदूं ज़मीन और पहचानूँ अपनी ही गहराइयाँ
लाश बना लूँ खुद को लिपट भी जॉन उसी से
एक चक्रव्हुह हो जिसके ठीक मध्य पे भी मैं
निकलने को छटपटा हुआ भी मैं जयद्रथ भी मैं
फिर गुज़रने का मन है उसी शमशान से
— दिवम्ना