अंधी बहरी ख्वाहिशों का बोझ उठाये फिरता रहूँ
इन सभी लाशों में एक लाश की तरह मैं भी जी लूँ
इन सभी सच्चे झूटों से लिपटा रहूँ और कुछ न कहूँ
क़त्ल और सिर्फ क़त्ल खुद का मैं करता रहूँ
ये कैसी आज़ादी मिली है मुझको मेरे होने की
ये कैसी आदत लगी है मुझको मेरे होने की
धुंआ धुंआ इन उजालों में एक अँधेरे को तरसुं
जैसा हूँ वैसा नहीं सब जैसे है वैसा मैं रहूँ
बदला मैंने दिन को रात जो कहना सब कहते है झूठा हूँ
बदला जो हर अहसास से लड़ना सब कहते है काफ़िर हूँ
राम नहीं न मोहम्मद मेरा सब मेरे दुश्मन है
मंदिर नहीं मस्जिद नहीं सब धोका है सब पागल है
अपने तन से जो खाल उतारूँ तब जानू मैं कैसा हूँ
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ जान भी लूँ गर ज़िंदा हूँ
कब तलक यूँ ख्वाहिशों का बोझ उठाये फिरता रहूँ
कब तलक यूँ ख्वाहिशों का बोझ उठाये फिरता रहूँ
— दिवम्ना