नहीं होना अमर मुझे
नहीं के मैं जाना जाऊं
बोध अबोध बाल बृद्ध तक
न ही पहचाना जाऊं
अपने ही गर्भ का भ्रूण मात्र मैं
स्वयं में लिपटूँ समां जाऊं मैं
मेरा सच मेरा हो इतना
खोज स्वयं की कर पाऊं मैं
गाड़े तन का मैल छूत है
श्रृंगार भ्रम के वशीभूत है
व्यापर बाजार की सिर्फ समाधी
अपनी रचनाओ का नहीं बेचा जाऊं मैं
नहीं होना अमर मुझे
नहीं के मैं जाना जाऊं
—दिवम्ना