कुछ नहीं मुश्किल मगर फिर है यहाँ आसान क्या
रोशनी के इन अंधेरों में छुपा हुआ इंसान क्या
दिन अधूरे रात काली स्याह हर पहचान क्या
कौंधती अशहिष्णुता में बदलता हुआ फिर भगवान क्या
दीप सब बुझ जाये और फिर ईद हो खून से भरी
काँटों से लदी हो डालियाँ काँटों की हो सेज धरी
प्यास छालों का लहू हो और लब आलावों से हो खरी
इस इंसान और उस भगवान से झरती हो अशहिष्णुता की झरी
अब बदलना भी चाहो तो बदलोगे अपनी पहचान क्या
इस हिमाला से उस गंगोत्तरी की रसधान क्या
छुपा हुआ काल धन क्या छुपा हुआ ईमान क्या
एक एक इंसान के अंदर पल रहा हैवान क्या
छोड़ दो अब तो मत पछताओ है भगवान क्या
जो मुह आया बोल दिया हो क्या तुम इंसान क्या
जले या दफनाए कबीर हिन्दू रहा या मुस्लाम क्या
मिटा दो अब दिलों से अल्लाह हो या भगवान क्या
— दिव्म्ना