अजीब लत है ज़िंदा रहने की
रोज मर कर भी पूरी नहीं होती
नसों में तड़पती रहती है
नोचती रहती है कानो की झिल्ली को
जैसे की आँखे पर्दों से लगकर चिल्ला रही हो
नाखून धस गए हो जिस्म में
और साथ छोड़ते ही न हो
उंगलियां रेंगती हो पैरों से लगकर
पूरी दुनिया समेट लेना चाहती हो
तब भी सफर ख़त्म नहीं होता
जबकि शाखें बोझल हो गयी हो
जड़ों ने सांस लेनी छोड़ दी हो
मुरझाई हर श्वास एक नए बीज
का उद्घोष हो गयी हो
मृत्यु सिर्फ भोजन बन गयी हो
और सींच रही हो नए जीवन को
जो कुछ छण पहले ही मृत्यु के
आलिंगन का भोग बना हो
अजीब लत है ज़िंदा रहने की
— दिवमना