एक उम्र सी मानो बीत गयी हो...
उन दोनों को साथ देखे, बातें किए हुए..पहले ये अक्सर साथ साथ दिखाई देते थे, फिर इनमें धीरे धीरे दुरियां बढती गई , ये दूरी का कारण कहीं न कहीं मैं खुद को भी समझती हूं, इन्हीं के चलते
कईं बार मैंने कोशिश की दोनों को साथ मिलाने और बिठानें की, पर दोनों को जैसे मिलना ही नहीं था....
शायद, नाराज़ से एक दूसरे से या फिर मुझसे ... मैं ही समय नहीं दे पायी उन्हें, जो मुझे देना चाहिए था।
पर, आज मैंने ठान लिया था कि इन दोनों का मिलाप करा कर रहूंगी , ठीक उसी तरह जैसे वे पहली बार ढ़लती शाम कीे सुनहरी छंटाओ के नीचे बालकनी मे एक साथ अदरक, इलायची वाली चाय का ज़ायका लेते हुए मिले थे
और देखो मैं इसमें कामयाब भी हुई...
उन दोनों को भी शायद इसी पल का इंतजार था, जहां वे प्रकृति की गोद मे सो कर समय बिता सके , जहां न कोई दुनियादारी का शोर हो न व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम , ट्विटर की पोस्ट्स का आंखों के लिए मेन्डोटरी होना हो...
बस फिर क्या...
जैसे जैसे चाय हर एक चुस्की के साथ खत्म होती जा रही थी वैसे वैसे उनके बीच की दुरियां भी ...
और आखिरकार उन दोनों का मिलन हुआ...
और ये थे मेरे "लफ्ज़ और अहसास"जो हर कविता मे रस भरते हैं,हर कहानी को एक सुंदर चेहरा देते हैं, जो मेरे हर कहे -न कहे जाने वाले जज़्बातों को ज़ुबां और यही दो हैं, जो मुझे "मुझसे" मिलाते हैं।


