कुछ समय से टकटकी लगाए,

बिना एक बार भी पलक झपकाए,

देख रही थी उस कूड़े के ढेर को,

कितना कुछ था उसमें अभी भी सहेजने को।

बहुत कुछ पड़ा था उस ढेर में,

पेड़ से गिरा पत्ता,

पुरानी कॉपी का गत्ता,

कुछ मुरझाए हुए फ़ूल,

इधर उधर से उड़ आई धूल,

मेरा टूटा हुआ खिलौना,

वो फटा पुराना बिछोना।

दिखा मुझे वो पुराना रिश्ता भी,

जिससे अब ना रहा था नाता कोई।

सोचा मैंने,

जब चीज़ें अलग होकर अकेली पड़ जाती,

तब शायद कूड़े के ढेर में ही पनाह पाती।

कोई भी चीज़ या रिश्ता सहेज के रखना हो,

तो उसमें अलगाव की भावना ना आने दो।

सोचती रही, देखती रही,

कितना कुछ पड़ा था उस ढेर में,

समेट लिया होता, सहेज लिया होता,

तो शायद वो सब ना होता उस कूड़े के ढेर में।