जो बुझ गए हैं दीप तो
फिर से जला
जो सो गए हैं ख़्वाब तो
फिर से जगा
उठ कर खड़ा हो
युद्ध में
जो कर्म पथ पर अग्रसर है,
फिर अडिग हो
तेरे नियत संकल्प पर
जो की प्रखर है ,
हो द्वंध जब भी
आत्मा का निज हृदय से
तू रौंद दे
उन धडकनों को,
अनुभूत कर स्पंदनों को
मस्तिष्क में जिसके लिए
तूने बुने सपने सजग
उनको नयी दे चेतना,
हृदय तारों को
सपन से फिर मिला
जो बुझ गए हैं दीप तो
फिर से जला ।


