क्या उसकी सूरत , क्या ही उसकी सीरत है ,

जिसके लब बस दुआ ही दे वो सफलता की मूरत है ,


दुनिया भर के सुख दुख में वो मेरी अहम जरूरत है ,

पांव छुए सब काम बने वो खुदमें एक महुरत है ,


तू कल्प तरू मेरी मां , मै एक छोटी सी कोपल हूं ,

मै अक्षर तो तू भाषा है , मै मिट्टी तो तू सांचा है ...

मां तेरी क्या परिभाषा दू ,


तुमसे मिला आचार व्यवहार , तुमसे ही मिला परिवार मुझे ,

मै नीरस जड़ थी अस्तित्वहीन तुमसे ही मिला आधार मुझे ,


तेरे साथ रहूं निर्भय , तू ना मिले सहम जाऊ ,

तुझ बिन लगू अधूरी सी , तुझसे ही पूर्णता पाऊ ,


कभी कुपित जो ना हो , यही तो है आचरण तेरा ,

इस निर्मम दुनिया में चाहूं तो बस मां एक आंचल तेरा ,


मै गढ़े का ठहरा पानी , तुम अविरल बहती सरिता हो ,

मां तुझपे क्या मै रचना करू , तुम तो पूरी कविता हो ,


होते पर्याप्त मेरे शब्द अगर , तुझपे तराना लिख गा देती ,

तू खुदमें है सम्पूर्ण सकल , मां इतनी कहां बिसात मेरी ...

मां इतनी कहा बिसात मेरी ।


MBD