मेरी खामोशी
मेरी खामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ
एक दिन जनेगी ये
तुम्हारी अपराध भावना को
मैं जानती हूँ कि
तुम साफ़ नकार जाओगे इससे अपना रिश्ता
यदि मुकर न भी पाये तो
उसे किसी के भी
गले मढ़ दोगे तुमकोई कमज़ोर तुम्हें
फिर बरी कर देगा
पर तुम
भूल के भी न इतराना
क्यूंकि मेरी खामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ।
एक बौनी बूंद
एक बौनी बूंद ने
मेहराब से लटक
अपना क़द लम्बा करना चाहाबाक़ी बूंदे भी देखा देखी
लम्बा होने की होड़ मेंधक्का-मुक्की लगा लटकीं
क्षण भर के लिए
लम्बी हुईं
फिर गिरीं
और आ मिलीं
अन्य बून्दों में
पानी पानी होती हुई
नादानी पर अपनी!
शब्दकोष
शब्दकोष वह अद्बभुत था, ‘युद्ध’ शब्द उसमें न था
‘शत्रु’ का था न अता-पता, ‘बारूद’ बेचारा क्या करता
’घृणा’ न थी न ‘द्वेष’ वहाँ, ‘आहें’ थीं न ‘बीमारी’
न ‘आँसू’ थे न ‘शोक’ वहाँ, न ‘मृत्यु’ न ‘गोलाबारी’
’बंजर’ शब्द का अर्थ वहाँ था, ‘सरसों के जैसा पीला’
’पतझड़’ था ‘बसंत’ वहाँ और ‘मरुस्थल’ था ‘नीला’
‘झूठ’ वहाँ था ‘जिज्ञासा’, ‘आलस्य’ वहाँ था ‘फ़ुर्तीला’
था ‘रोना’ मुस्कान वहाँ और ‘बेसुर’ था ‘एक गीत सुरीला
‘विनम्र, परिष्कृत, सदय’ तो थे, किंतु न थे ‘नैराश्य, हताशा’
थे ‘रामराज्य शुभ मंगलमय, सम्मान स्नेह, गौरव, मर्यादा’
शब्दकोष सीने पर रख, मीठे सपनों में व्यर्थ बही
सुबह आज जब मैं जागती काश कि रहते अर्थ वही!
दिव्या माथुर
vatayanpoetry@gmail.com


