हम तो ख़ुद भी नहीं हैं ख़ुद के,
किसी और में कैसे ख़ुदा तलाशें।

जो ख़ुद से ही वफ़ा कर न सके,
वो किसी और में क्या वफ़ा तलाशें।

अपने ही सवालों से भागे हैं,
किसी और में क्या जवाब तलाशें।

दिल को ख़ुद ही समझा न सके जब,
किसी और में क्या सुकून तलाशें।

आईना रोज़ यही पूछता है—
किस चेहरे में अपना चेहरा तलाशें?

उम्र गुज़र गई ख़ुद को ढूँढ़ते,
अब ख़ुद में ही
अपना पता तलाशें।