किसी को अपना हल बताने से क्या होगा
जो तुमसे न हुआ ज़माने से क्या होगा

भरोसा रखो खुद पर यही बेहतर है
कोई आये न आये बुलाने से क्या होगा

भूल गया होगा वो मुझे अब तो शायद
अब उसकी बज्म में जाने से क्या होगा

जो न पढ़ सका तेरी खामोश ऑंखें भी
सामने अब आंसू बहाने से क्या होगा

अब तो बढ़ा ली हमने दूरियां तेरे दिल से
अब मेरी ग़ज़ल गुनगुनाने से क्या होगा

मुझे खामोश रखना है तो मेरी जुबान काट दे
मुझे ऑंखें दिखाने से क्या होगा