# कोलाहल

वो गीत नही जो मन ना भरे

वो प्रीत नही जो रस ना जगे ।


ये रुक रुक कर बूंदा-बांदी

ये छुप छुप कर आती आँधी

पागल बन मुझको देख रहे

स्तब्ध हुए चुपचाप खड़े !



मैं खुद में "मैं"को घोल चुका

अपने वजूद को तौल चुका

फिर क्यों जी रहा डरे डरे

लोचन में आँसू भरे भरे !


कुछ कर दूँ या फिर चुप बैठू

मन आग भरे तन उसमे जले

पर जब देखूँ मैं दीन भरम

रह जाता हाथ पे हाथ धरे !


ये कल में पल जो बीत गये

आज भी लौट के आते हैं

कहते हैं उठ चल भाग दौड़

करले बुलंद किस्मत की जड़ें !



अब कौन इसे समझाए कहे

मैं कहता सच मैं करता सच

लेकिन इच्छा है दुनिया की

ये शख्स बस खामोश रहे !


~दिशव