जब भी कभी जीना चाहो ख़ुद के लिए, तो करलो दोस्ती अकेलापन से। अकेलेपन से आख़िर डरना क्यूँ , जब ख़ुद के साथ हैं हम ख़ुद। हर बात पर क्यूँ सोचना कि अकेला हो गया हूँ मैं, आख़िर हमसे अच्छा दोस्त हमारा बन सकता है कौन। सोचो कभी अकेलापन ना आता ज़िंदगी में, तो शान्त मन से कभी ख़ुद के लिए कुछ सोच सकते थे हम। अकेलापन ना होता तो ख़ुद को समझ सकते थे कभी। अकेलापन ना होता तो ख़ुद से प्यार कर सकते  थे कभी। अकेलापन ना होता तो ख़ुद की ख़ूबियाँ जान सकते थे कभी। हाँ करली दोस्ती अकेलेपन से मैंने क्यूँकि ज़िंदगी को जीना सिखा है मैंने अकेलेपन से। हाँ करली दोस्ती अकेलेपन से मैंने क्यूँकि अब बस जीना है मुझे ख़ुद के लिए। अकेलापन इतना भी बुरा नहीं मुसाफ़िर , जब भी कभी जीना चाहो ख़ुद के लिए तो करलो दोस्ती अकेलेपन से।