मन का दुःख किससे कहें,सब दुःख के आधीन
हम बतलइहें एक दुःख ,सब बतलइहें तीन।
धर्मध्वजा सौंपी जिन्हें ,धर्म का करते नाश
चाँद बादलों ने ढका ,जुगुनू करत प्रकाश।
संचारों ने कर लिया ,पृथ्वी को आधीन
घटे फासले तो मगर ,दूर हुए गुन तीन।
डिग्री लिए प्रदेश में ,मूरख फिरते आज
वेद लादकर पीठ पर,गधे चरें ज्यों घास।
धर्म जाति सब अलग थे ,पर मन से थे एक
राजनीति ने हर लिए ,सबके ज्ञान ,विवेक।
मानवीय संवेदना, सबसे बड़ा है धर्म
बढ़ती जाती भागवत,घटता जाता मर्म।
करते थे भंडारे जो ,एक वर्ष में तीन
आज उन्होंने छीन ली ,भाई की ही ज़मीन।
नागनाथ को हराकर ,ले न पाये थे सांस
सत्ता सौंपी अब जिसे ,वो भी निकला सांप।
काम थे पैसे जेब में ,लेकिन था उल्लास
धन से जेब भरी मगर ,मन हो गया उदास।
मित्र जानकर दर्द का ,जिसको किया बयान
इठला इठला जगत में वही करे अपमान।
नीर पिएं और त्रण भखैं ,हंसों का अपमान
क्षीर पात्र के साथ अब वक पाएं सम्मान।
जो मंदिर में कर रहे ,पूजा सौ सौ बार
मूर्ति बेच भगवान् की ,वही करें व्यापार।
बहुत लगाई अक्ल पर ,नहीं पा सके पार ,
सत्ता के दरबार में ,ठगे गए हर बार।
धन को कमाना सिखाते ,सब शिक्षा संस्थान
पर सुख कैसे कमाना ,उससे सब अंजान।
इतने भरोसे हट गए,इस दुनिया में आज
अपने हाथ से सकुच कर ,मिलता दूजा हाथ।
जो खम्भा था तीर और तोप को करता मात
धन -सत्ता के चक्र ने ,उसे किया बर्बाद।
कोई मुकदमा जनम भर ,अगर न निर्णय पाय
अगला जनम तो है अभी ,मन काहे घबराए।