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धैर्य विवेक न हो जहाँ, निश्चित बिगरें काज

धैर्य विवेक न हो जहाँ,निश्चित बिगरें काज संभव है दोनों मिलें ,जूते भी और प्याज बड़ीं बड़ीं हैं डिग्रियां ,नहीं सके पर जान सहज सरल निष्कपटता सबसे बड़ा है ज्ञान रक्षक ही ज्यों देश के करें देश की लूट राजनीति में देश की दिखे वही करतूत सारे धंधे एक तरफ यह राजनीति बहुधंधी जनहित केवल ढकोसला है सत्ता लूट की मंडी जिनकी पहरेदारी में सब देश को लूटें खाएं उनकी ईमानदारी को हम ओढ़ें या कि बिछाएं अलीबाबा चालीसचोर का जो किस्सा प्रचलन में उसका ही दोहराव सियासी भवनों के आँगन में बुरा लगे या भला लगे ऐ सत्ताधारी सुन ले राजनीति की भ्रष्टता भ्रष्ट प्रशासन जन्मे मना आप महान हैं विशेष हैं अधिकार पर विशेष से भी विशेष हैं जनता के अधिकार कुछ लोगों को थोड़े समय को मूर्ख बनाना संभव लेकिन सब को सदा सदा को बहलाना है असंभव कलियुग के परताप सों समय गया वो आय कांच छत्र में सोहता ,हीरा ठोकर खाय बिना विचारे जो करे कांग्रेस हुइ जाय थू थू होवे जगत में जनता क्रोध जताय वोट डालना मत देना ही जन की ज़िम्मेदारी वोट को पाकर लूट करें ये उनकी फ़ित्रत ज़ारी शत्रु मित्र नज़दीकियां या फिर हो पहचान राजनीति में किसी को स्थाई मत मान बाहर से सब अलग अलग हैं अंदरखाने एक हैं सब की मंशा वही लूट है मौसेरे सब एक हैं हर दल में कुछ कलमाड़ी हैं हर
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