वो मजबूर थी......


उसने जिस्म बेचा वो मजबूर थी

तुम नोचते रहे उसके तन को

जैसे वो खरीद हुई मजदूर थी


बेपर्दा हुई अपने पेट की खातिर

शरीफ थी नहीं थी वो शातिर

उसका कर्म था तेरी करतूत थी


तुम तो भक्ति भाव रखते हो

दान पुण्य का कर्म करते हो

उसका जिस्म ढकना तेरी दस्तूर थी ।।


  दिन-ऐश