स्पर्श से पहलें ही

चैतन्य मातृत्व

कलाइयों पर सजता

गर्वित भ्रातृत्व

कंधो पर बैठाता 

झूमता वात्सल्य

और बाहों में भरता,

चूमता मांगल्य

प्रेम है


भक्ति का राग

वैचारिक प्रयाग

सेवा का भाव

अंतरंग चाव

देह का तर्पण

निस्वार्थ समर्पण

प्रेम ही तो है


प्रेम कण कण में समाहित,

अनंत,अनेकार,द्रव्यतुल्य है 


प्रेम ईश्वर है!


~दिनेश चौधरी ©️