जब तब जो मंदिर चली जाए

दुआओं में भी जो ममता छलकाए

जो अपनी पीड़ा सबसे छुपाए

पर बच्चों के लिए वो हरदम दौड़ी चली आए

ऐसे असीमित व्यवहारों का उपन्यास है माँ !!


जो तिनका तिनका जोड़ के घर को चलाए

जो परिवार की ख़ुशी में त्यौहार मनाए

जो सबकी सेवा में खुद को भूल ज़ाए

पर चाहे बदले में वो कुछ भी ना पाए

ऐसे असीमित व्यवहारों का उपन्यास है माँ !!

 

जो बिन कहे सब कुछ समझ जाए,

जो मीठी लोरियाँ गा कर सुलाए,

जो सबके बाद मे खाए,

जो सर्दी की ठंडी रातों मे बीन बिस्तर सो जाए,

ऐसे असीमित व्यवहारों का उपन्यास है माँ !!


जीवन के ख़ूबसूरत पलो का सबसे मीठा एहसास है माँ,

उँगली पकड़कर चलना सिखाती गुरु और पहला प्रयास है माँ,

दोपहर कि जलती धूप मे शीतल छाँव का विश्वास है माँ,

अलौकिक शक्तियों की स्वामिनी ईश्वर का मूलनिवास है माँ,

ऐसे असीमित व्यवहारों का उपन्यास है माँ !!


~दिनेश चौधरी ©️