बाहर का मौसम कैसा भी हो .....

लेकिन अंदर के

मौसम का हाल ही अलग होता है,

कोई क्या सोच रहा है ?

क्या महसूस करता है? क्या दिखावा है?

क्या अस्लीयत !

कुछ भी दिखता नहीं :

हाँ , सुख दुख का अंदाजा

हँसी और आँसु से लगा लेते है|

बाहर की बहार अंदर की ऋतु

को मिटा नहीं सकती,

बाहर की कड़ी धूप भी

इंसान के अंदर के अंधेरे दूर नहीं कर सकती,

और अफसोस कि

अंदर का मौसम

जानने के लिए कोई तरीका भी नहीं,

शरीर का तापमान मापा जा सकता है,

ठंडा शरीर बताया जा सकता है,

लेकिन आत्मा की गर्मी या सर्दी

दूर नहीं की जा सकती,

उसे तो अंततः उजागर ही रहना है......