तुम पुरुष मैं नारी
मत दो नाम इसे
कोई और !
पंचतत्व रचित देह ये
कहती
तुममें मुझमें कोई भेद नहीं !
तुम मनु मैं श्रद्धा
इक दूजे के पूरक हैं
बात इतनी सी ही है सही !
मैं ब्रहमाँड़ी ,फिर छत्राड़ी ,
जाने कब बन गयी अबला ?
बहन ,पत्नी , माँ बना
रिश्तों से मुझे छला !
स्वार्थवश
नये नये दे नाम
विस्मृत कर दी मेरी निज पहचान !
करते हो नारी सम्मान की बात
सम्मान नहीं, समानता चाहिये
बंधन नहीं मुक्ति चाहिये
क्यों बांधू धागा तुम्हें
रक्षा स्वयं मैं कर लूँगी !
क्यों रहूँ दास-वधु बन
निज ग्रह सुन्दर मैं कर लूँगी !
माँ की छाती से अलग हो
तू दुनिया नयी बसा लेगा
मैं इंतज़ार में तेरे , नैनों में झाई कर लूँगी !
संसार सब मैं देख चुकी
पुरुष प्रधान अब बन बैठा !
रिश्तों की आड़ में
नारी को कहीं छुपा बैठा !
ना मैं दुर्गा, ना मैं काली
मत मेरा गुणगान करो !
जान नारी तुम समान व्यवहार करो !
वस्तु नहीं, विचारवान हूँ मैं
देवी नहीं इंसान हूँ मैं !
रचने दो धरा पर
मुझे नये आयाम !
करने दो मधुर स्वतंत्रया गान !