जाऊ मैं जितना दूर उतना ही करीब आ जाता हूँ सजदे में तेरे मैं अक्सर झुक जाता हूँ ये मोह है तेरा या है कोई वहेम मन्नत की डोरी हर दर पे तेरे नाम की...मैं...बांध आता हूँ एक सुकून सा मिलता है अपने अंदर जब जब तुझसे में मिल आता हूँ थोड़ा सा कभी तुझे खो देता हूँ थोड़ा थोड़ा कभी.....पा जाता हूँ