जाने क्या हुआ है मुझे क्यो बदल सी गई हुँ मैं...
एक बूदँ की प्यास थी सागर मिल गया
जैसे किसी बच्चे को मनपसंद खिलौना मिल गया हो
कैसे वो मुझ पर फिदा हुए ऐ दिल-ए-नादान तुझे ऐतबार क्यु नही होता......
कभी कभार सूरज को चादँ ढक लेता है
दुनिया इसे सूर्यग्रहण कहती है हम इसे चादँ का सूरज पर उपकार....
जो दिया महीनो बाद इतनी आराम...