मुफ्त मिला है तुझे शायद इसलिए कदर नही तुझे
सूरज,जल और हरा भरा वन सब कुछ दे दिया तुझे
जिस धरती पर तु सीना ताने खड़ा है माँ है वो तेरी
तुझे आँचल समेटे है तुझे ऐे बेखबर इंसान
आसमान पिता है जििसकी छञ छाया पल रहा है संसार....
मत बहा व्यरथ जल को..नदियां सुख जाएंगी
मुफ्त मिला है तुझे शायद इसलिए कदर नही तुझे
किम्मत देकर हासिल करना पड़ेगा एक दिन तुझे....
काटे रहा तु जिसे तु बेलगाम वन को एक दिन बड़ी जददोजद तुझे ही फिर उगाना पड़ेगा...
वो दिन फिर दूर नही हर घर मे बगीीचा हो जाएगा आवश्यक....
मुफ्त मिला है तुझे शायद इसलिए कदर नही तुझे
उठा रहा है तु जो सुख सुविधाओ का मजा
भेद दिया जो इसने आसमान की परत को....
भोगेगा तु ऐ बेखबर इंसान.....
मुफ्त मिला है तुझे शायद इसलिए कदर नही तुझे
माँ को कभी कभी क्रोध आता है जो भूकंप के झटके लाता है
संभल जा इंसान तु.... माँ हुँ मैं प्यार लुटाऊगी फिर बेपनाह .…....
बहुत दिया है तुझे बस अब तु कदर कर...