कुछ ऐसा मंजर भी जिंदगी में आता है कभी-कभी मेरा अक्स मुझसे रूठ जाता है रूह भी महफूज नजर नहीं आती जब यह है मन की अमान्य बातों में आ जाता है ईश्वर भी छुपके ना जाने किस कोने में बैठ जाता है बोझिल हो जाता है दिमाग नकारात्मक विचारों से   तभी इंद्रियां संकेत देती हैं कर लो हम को काबू में सांसों के उतार चढ़ाव को बांध लो कभी बांध लो मनपसंद गीतों के धुनो में में बिखरहा है कुछ आस पास तो समेट लो अपने बचपन को याद करो और खेल  कोई खेलो भूल जाओ खुद को किसी बालक की अठखेलियों में.. सब कुछ संवर जाएगा....  जब मन उल्लास से भर जाएगा..