हम सब जी रहे हैं एक दूसरे के लिए लेकिन इस बात से अनजान है इंसानी फितरत है जहां स्वार्थ नजर आता है वहां दोस्ती का हाथ खुद-ब-खुद बढ़ जाता है कड़ी से कड़ी जुड़ी हुई है यह जंजीर बनी हुई है हम सब इंसान एक दूसरे से जुड़े हुए हैं बिना किसान के अमीर अनाज नहीं खा सकता बिना मजदूर के घर खड़ा नहीं किया जा सकता गरीब में अभिमान है और अमीर मैं अहंकार है फौजी में स्वाभिमान है देश पर मर मिटने पर उस को नाज है पुलिसवाला थोड़े पैसे दे बिकने को तैयार है नासमझ कि तू धरती पर बोझ है तू भी हरकत में आ जाए तेरे पास भी कोई ना कोई आएगा...