वो तो करने आएंगे आघात तुम्हारी बस्ती में ।

हाथ जोड़कर बोलेंगे कुछ बात तुम्हारी बस्ती में ।

जात पात सब भूल भुलाकर तुमको गले लगाएंगे ,

बेचेंगे वो खड़े खड़े जज्बात तुम्हारी बस्ती में ।


दोहराएंगे नये नये अध्याय तुम्हारी बस्ती में ।

बड़े बुजुर्गों को भी देंगे राय तुम्हारी बस्ती में ।

कुछ पूछोगे पिघल जाएंगे, हँसकर तुमसे लिपट जाएंगे ,

फिर बोलेंगे बहुत हुआ अन्याय तुम्हारी बस्ती में ।


खुद का करने आएंगे उद्धार तुम्हारी बस्ती में ।

जीतेंगे तो भड़केंगे अंगार तुम्हारी बस्ती में ।

सोच समझकर अपने मत का करना तुम उपयोग ,

वरना ,खुल जाएगा गुंडों का व्यापार तुम्हारी बस्ती में ।


✍ धीरेन्द्र पांचाल