बेसुध पड़ी थी लाश तुम्हारी , मैं बैठा था कोने में ।

डर लगता था भैया तेरे बिना अकेले सोने में ।

कहाँ गए दिन चार हमारे चाय पे चर्चा नीली बत्ती ।

दाल भात चोखा से चलती थी अपने जीवन की कश्ती ।


इलाहाबादी गली मोहल्ले सबकी आँखे भरी हुई थी ।

कमरे में देखा था मैंने लौकी भिन्डी पड़ी हुई थी ।

अदरक वाली चाय की खुश्बू का अभिवादन कौन करे ।

विशेषज्ञ मैं रोटी का था दाल में तड़का कौन भरे ।


इतनी जल्दी हार गए क्यों हमको साहस देते थे ।

डर लगता था तुमको तो क्यों चुपके चुपके रोते थे ।

गर हमको भी बतलाते तो संग में दोनों रो लेते ।

काँटों वाली पगडण्डी पर फूल की क्यारी बो देते ।


फटी सीट साइकिल की मेरी मुझको भी उपहास मिला था ।

तुम्ही अकेले नहीं थे जिसको अपनों से परिहास मिला था ।

शादी का तुम न्यौता दोगे वादे तुमने तोड़ दिए ।

पंखे को वरमाला डाला बाकी रिश्ते छोड़ दिए ।


कहते थे जब लेख तुम्हारी दरबारों में जाएगी ।

जीवन की रंगोली अपनी अखबारों में आएगी ।

हार गए या जीत गए तुम बस इसकी परिचर्चा थी ।

अखबारों के छोटे से हिस्से में तेरी चर्चा थी ।


लौट आओ तुम सुनो दोबारा चावल की गठरी लेकर ।

आँखों में सपने लेकर तुम बाबू की पगड़ी लेकर ।

लाखों की है भीड़ यहाँ पर सबको कई समस्या है ।

इच्छाओं पर धैर्य का पहरा सबसे बड़ी तपस्या है ।


✍ धीरेन्द्र पांचाल