भारत माँ की पीड़ा गाने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


मखमल के गद्दे हैं मिलते चाटुकार गद्दारों को ।

कड़ी सुरक्षा मिलती देखो दारू व ठेकेदारों को ।

मजलूमों के दर्द सुनाने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


माँ रोती है भूखे बच्चे की कोई जुगत लगाती है ।

ईंट के भट्ठे कल कारखाने में वो खटने जाती है ।

खुद की थाली रोज सजाने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


जिस देश में अन्तर्मन से बिलख रहे नवजात ।

लगता घोर प्रभंजन वाली होगी फिर बरसात ।

एक सांस में मानस रटने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


पेट की अग्नि सह जाते हैं ऐसे कुछ किरदार ।

सबको अमृत बाटेंगे हम कहता है अखबार ।

खुद को राम - रहीम बताने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


बौने हैं किरदार तुम्हारे बौने सब आयाम ।

भूखे पेट सिखाता सबको करना प्राणायाम ।

आसमान से फूल गिराने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


दरबारों में कलम बेंच दी शर्म नहीं फनकारों को ।

निद्रा कैसे आती होगी दिल्ली के सरदारों को ।

देश बेंचकर देश बचाने वाले वे सब कहाँ गए ।

मैं भी चौकीदार बताने वाले वे सब कहाँ गए ।


✍ धीरेन्द्र पांचाल